गुरुवार
मैं मिट्टी में मिल जाऊंगा एक दिन।
तेरी चाहत में हद से गुजर जाऊंगा एक दिन,
प्यार होता है क्या ये दिखाऊंगा एक दिन,
तेरी संगदिली को सहते-सहते,
मैं अपनी जान से जाऊंगा एक दिन,
अपनी चाहते सारी तुझपे वार के,
प्यार करना तुझे भी सिखाऊंगा एक दिन,
जी ना पाएगी तु भी हो के जुदा मुझसे,
ऐसा प्यार तुझ से कर जाऊंगा एक दिन,
अंधेरो में ढूंढ़ती रह जाएगी मुझको,
ऐसी बेरूखी दिखलाऊंगा एक दिन,
खो कर मुझ को बहुत पछताएगी सनम तु,
वफा ऐसी तुझ से कर जाऊंगा एक दिन,
ऐसी दिवानगी से चाहूंगा तुझको,
भूल जाओगी तुम भी सारा जहान एक दिन,
जान तेरी भी लबों पर आ जाएगी,
बन के खाक जब मैं मिट्टी में मिल जाऊंगा एक दिन।
सोमवार
समुद्र की लहरें
समुद्र की लहरें
कितने जोश में
कितने वेग से
चली आतीं हैं
इतराती, मंडराती
किनारे की ओर।
कितने जोश में
कितने वेग से
चली आतीं हैं
इतराती, मंडराती
किनारे की ओर।
और रह जातीं हैं
अपना सर फोड़कर
किनारे की चट्टानों पर।
लहर ख़त्म हो जाती है
रह जाता है-
पानी का बुलबुला
थोड़ा-सा झाग।
अपना सर फोड़कर
किनारे की चट्टानों पर।
लहर ख़त्म हो जाती है
रह जाता है-
पानी का बुलबुला
थोड़ा-सा झाग।
लहरें निराश नहीं होतीं
हार नहीं मानतीं।
चली आती हैं
बार-बार, निरंतर, लगातार
एक के पीछे एक।
हार नहीं मानतीं।
चली आती हैं
बार-बार, निरंतर, लगातार
एक के पीछे एक।
एक दिन सफल होती हैं
तोड़कर रख देती हैं
भारी भरकम चट्टान को
पर फिर भी शांत नहीं होतीं
आराम नहीं करतीं।
तोड़कर रख देती हैं
भारी भरकम चट्टान को
पर फिर भी शांत नहीं होतीं
आराम नहीं करतीं।
इनका क्रम चलाता रहता है।
चट्टान के छोटे-छोटे टुकड़े कर
चूर कर देतीं हैं-
उनका हौसला, उनके निशान।
बना कर रख देतीं हैं
रेत
एक बारीक महीन रेत
समुद्र तट पर फैली
एक बारीक महीन रेत।
चट्टान के छोटे-छोटे टुकड़े कर
चूर कर देतीं हैं-
उनका हौसला, उनके निशान।
बना कर रख देतीं हैं
रेत
एक बारीक महीन रेत
समुद्र तट पर फैली
एक बारीक महीन रेत।
मज़ा आ रहा था उन्हें
परखते रहे वो हमें सारी ज़िन्दगी,
हम भी उनके हर इम्तेहान में पास होते रहे,
मज़ा आ रहा था उन्हें हमारी आंसुओं की बारिश में,
हम भी उनके लिए बिना रुके रोते रहे,
बेदर्द थे वो कुछ इस क़दर,
... नींद हमारी उड़ा कर खुद चैन से सोते रहे,
जिन्हें पाने के लिए हमने सब कुछ लुटा दिया,
वो हमें हर कदम पर खोते रहे,
एक दिन हुआ जब इसका अहसास उन्हें,
वो हमारे पास आकर पूरे दिन रोते रहे,
और हम भी खुदगर्ज़ निकले यारों,
के आँखे बंद करके कफ़न में सोते रहे.....
हम भी उनके हर इम्तेहान में पास होते रहे,
मज़ा आ रहा था उन्हें हमारी आंसुओं की बारिश में,
हम भी उनके लिए बिना रुके रोते रहे,
बेदर्द थे वो कुछ इस क़दर,
... नींद हमारी उड़ा कर खुद चैन से सोते रहे,
जिन्हें पाने के लिए हमने सब कुछ लुटा दिया,
वो हमें हर कदम पर खोते रहे,
एक दिन हुआ जब इसका अहसास उन्हें,
वो हमारे पास आकर पूरे दिन रोते रहे,
और हम भी खुदगर्ज़ निकले यारों,
के आँखे बंद करके कफ़न में सोते रहे.....
आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.
मेरे गीतों को होठों से छू लो जरा
ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.
वक़्त बे वक़्त यूँ ना लो अंगड़ाइयां, देखने वाला बेमौत मर जायेगा.
होंठ तेरे गुलाबी ,शराबी नयन.
संगमरमर सा उजला है , तेरा बदन.
रूप यूँ ना सजाया - संवारा करो, टूट कर आईना भी बिखर जायेगा.
ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.
सारी दुनिया ही तुम पर, मेहरबान है.
देख तुमको फ़रिश्ते भी, हैरान हैं.
मुसकुरा कर अगर तुम इशारा करो , आदमी क्या - खुदा भी ठहर जायेगा.
ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.
तुम तसव्वुर की रंगीन, तस्वीर हो .
सच तो ये है कि लाखों कि, तकदीर हो.
मेरे गीतों को होठों से छू लो जरा, खुद ब खुद भाव उनका निखर जायेगा.
ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.
ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.
वक़्त बे वक़्त यूँ ना लो अंगड़ाइयां, देखने वाला बेमौत मर जायेगा.
होंठ तेरे गुलाबी ,शराबी नयन.
संगमरमर सा उजला है , तेरा बदन.
रूप यूँ ना सजाया - संवारा करो, टूट कर आईना भी बिखर जायेगा.
ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.
सारी दुनिया ही तुम पर, मेहरबान है.
देख तुमको फ़रिश्ते भी, हैरान हैं.
मुसकुरा कर अगर तुम इशारा करो , आदमी क्या - खुदा भी ठहर जायेगा.
ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.
तुम तसव्वुर की रंगीन, तस्वीर हो .
सच तो ये है कि लाखों कि, तकदीर हो.
मेरे गीतों को होठों से छू लो जरा, खुद ब खुद भाव उनका निखर जायेगा.
ज़ुल्फ बिखरा के छत पे ना आया करो , आसमाँ भी ज़मीं पर उतर आयेगा.
बुधवार
भोजपुर जिला का इतिहास बड़ा ही गौरवर्पूर्ण रहा है यहाँ चप्पे -चप्पे पर इतिहास के पांवो के निशान कायम है इतिहास के पन्नों पर गौर करें तो महर्षि जनक,महर्षि विश्वामित्र,पुरुषोत्तम राम लक्ष्मण ,तिर्थकर महावीर ,गौतम बुध मैगास्थनीज़,फाहियान,ह्वेनसांग,
राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिकर ने कहा था की नारि तुम श्रद्धा हो विश्वास की शाम की सूर्यास्त होते ही अर्धविक्षिप्त नारियों व युवतियों के साथ हवस के दरिंदों की हैवानियत को आँखों के सामने देखने वाली पुलिस व प्रशाशन क्यूँ कुछ भी कहने व करने से कतरा रही है ? गुमनाम नारियों की आबरू को तार तार करते व उनके शरीर पर लगे दाग तथा खून लगे कपड़ों से सहज अनुमान लगाया जा सकता है की रात के अँधेरे में इनके साथ क्या किया जाता है ! इसके बावजूद भी अपनी मानसिक संतुलन खो चुकी ये अबलायें सब कुछ सहन करने के बाद भी खामोश रहती हैं ! यहाँ तक की कुछ युवतियां समय से काफी पहले ही गर्भवती हो जमाने की यातना सहने को विवश है ! दिसंबर 2009 में सामाजिक अधिकारिता मंत्रालय के जारी आदेश पर बिहार सरकार के मुख्य सचीव द्वारा राज्य के सभी जिलाधिकारियों को पत्र भेजकर भीख मांगकर गुजारा करने वालों ,फूटपाथ पर रात गुजारने वालों ,निः शक्त लोगों ,अर्धविक्षिप्त लोगों को चिन्हित कर पुनर्वास योजना के तहत बेहतर इलाज़ ,रोजगार की व्यवस्था परिजनों तक पहुंचाने व खान पान दवा आदि की व्यवस्था सुनिश्चित किये जाने का फरमान जनवरी 2010 में जारी किया गया था !
इसके वावजूद भी इस जिले की आरा ,बिहियां व पिरो रेलवे स्टेशन सहित जगदीशपुर आरा बिहिया पिरो सन्देश गड़हनी कोइलवर बडहरा और हसनबाज़ार के बाज़ारों में सड़कों पर दिन रात विचरण करने वाली इन नारियों को देखने के बाद भी प्रशाशन के अधिकारियों की आँखों से ये सब कुछ दिखाई क्यूँ नहीं देता है क्या सही में दीखाई नहीं देता या देखकर भी नहीं देखना चाहते है संवेदन शून्य पुलिस व प्रशाशन की आँखों के सामने जिले के प्रमुख शहरों व रेलवे स्टेशनों में दर्जनों अर्धविक्षिप्त नारियों व युवतियों को बहसी दरिंदों द्वारा कब तक हवस का शिकार बनाया जाता रहेगा ? केंद्र व राज्य सरकार द्वारा जारी आदेश इनके लिए कब तक लागू किये जायेंगे ? इन सवालों का जवाब देने वाला कोई नहीं है आखिर क्यूँ ?
प्यार की भाषा
कोशिश करना तुम्हारे बाद ये भाषा ख़त्म हो जाए
इन दिनों सांस तभी चलती है जब पेंसिल अंगुलियाँ रिवाल्भ करतीं है!
मुझे प्रेम से पीछे और इसके आगे कोई सभ्यता, कोई गली, कोई प्रथा नजर नहीं आती
तुम जब चाहो मेरे दिल के 52 पत्ते गिन लो दोस्तों में बटा हुआ भी साबुत हूँ मैं,
मुझे आज भर फुर्सत है कल मुझे मरने का भी वक़्त नहीं, चलते चलते मैं कहीं
अपने पाँव गिरा बैठा हूँ ! मुझे छुओ गूंगे की तरह मुझे चख लो धरती पर चखे गए सबसे पहले फल की तरह
मैं प्यार से लबालब हूँ प्यार का प्यासा, नहीं मालुम है मुझे प्यार की परिभाषा,
कम दिन हूँ इधर मेरे होने का शोर बहुत है ...मुझे ख्वाहिश भी नहीं मेरे जाने के बाद लोग मुझे समझे
तुम कोशिश करना तुम्हारे बाद ये भाषा ख़त्म हो जाए
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