शनिवार

जहवा जइबा उहे लुटईबा सब बाटे खखुआइल... सब बाटे खखुआइल





बड़ा बाग बा…बड़ा लाग बा जिंदगी बा अझुराईल
कहीं रौशनी लउकत नइखे आसमान बा बदराईल…. आसमान बा बदराईल

डगर-डगर पर काँट बिछल बा पनघट-पनघट धोखा 
फुल-फुल विष से मातल बा मौसम बा भंगियाइल…मौसम बा भंगियाइल

जात-पात में भूलल केहू, केहू मंदिर मस्जिद
केहू गिरजाघर गुरुद्वारा मानव धर्म भुलाईल …मानव धर्म भुलाईल

लोग बाग के छल प्रपंच में नाक-कान ले डुबल आगे पाछे कुछ ना सूझे 
स्वारथ बा गड़ुआइल…… स्वारथ बा गड़ुआइल  ….

लहकत बा केहू के छाती लहकत मडई-भुसहुल
माल-जाल के के कहो आदमी  ले  झोकराइल आदमी  ले  झोकराइल  …

बम फूटता जहवाँ तहवाँ गरदन कहीं कटाता
देश लुटाता देश बिकाता दुश्मन बा अगराइल..... दुश्मन बा अगराइल

केहू नइखे आगे आवत नइखे आग बुझावत
नीमन लोग किनारा कइके आपन माल  लुकाइल ....आपन माल लुकाइल

साधू  संत के भेष भर बा योग युगुत कुछ नइखे 
राह रहन इनकर बा जुगुआइल आ भसिआइल…. जुगुआइल आ भसिआइल 

कहवा बा बिश्वास आस अब कहवा माथ टेकाई
जहवा जइबा उहे लुटईबा सब बाटे खखुआइल... सब बाटे खखुआइल

आपन भाग्य सावारा अपने आपन ज्योत जगावा
भैया शक्ति बटोरा आपन जेतना बा छितराईल ……जेतना बा छितराईल

बाहर से ना आवे कुछुओ अन्दर शक्ति भरल बा
जैसे तकबा तैसे भीतर लहकी बा आग दबाईल…लहकी बा आग दबाईल

उठा आगाड़ी आवा तू मुहवा जोहल छोड़ा
जहावा भइला ठाढ़ देहिया झार भुत पराई ….देहिया झार भुत पराई

सोमवार

तेल भईल बा मंहगा, मंहगा भईल बा पानी, कवन चीझ बा सबसे सस्ता बुझs बुझौवल तs जानी।

गंगा जमुना कोसी गंडक, चले चाल मस्तानी,
नेता जी के ठाठ बाठ बा गाँव में भरल बा पानी।
वाह जोगी जी वाह वाह, जोगीरा सा रा रा रा।

दिल्ली देखs पटना देखs सहर देखs कलकात्ता
सहर सहर अंजोर भईल बा गाँव भईल नापाता।
वाह जोगी जी वाह वाह, जोगीरा सा रा रा रा।


काहे खातीर करूणा रूसा, काहे खातीर ममता
काहे खातीर मुलायम रुसा , बुझत बिया जनता।

सत्ता के सब खेल है भईया , सत्ता ही हवे निशानी,
एही खातीर मुलायम रूसे, नितीश बोले मीठी बानी।
वाह जोगी जी वाह वाह, जोगीरा सा रा रा रा।


कवन देश से आया रे भैया, कवन देश तोर गाँव रे,
कवन जात से आया तू,बता दे अपना नाँव रे।
भारत माँ के गाँव बता दे जवन तोर महतारी
गंगा मैया के जात बता दे जवान पाप के हारी।

कवन तोर गुरु है राज, का है तोरा काज रे बाज
भाई भाई को बाँट के का तोहे मिलेगा ताज?
वाह जोगी जी वाह वाह, जोगीरा सा रा रा रा।


तेल भईल बा मंहगा, मंहगा भईल बा पानी,
कवन चीझ बा सबसे सस्ता बुझs बुझौवल तs जानी।
खून भईल बा सबसे सस्ता, बेमोल भईल बा ग्यानी,
दुराचार आसान भईल बा, अमोल भईल अधम अभिमानी।
वाह जोगी जी वाह वाह, जोगीरा सा रा रा रा।

एक हाथ से घिसे सिलबट्टा एक हाँथ में कट्टा,
बन जा रानी लक्ष्मीबाई तू हर ल रावन के दुपट्टा।

बुधवार

सम्मान उनके हाथों का स्पर्श पाकर सम्मानित होते थे..

आज भारत रत्न शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान की जयंती है ...

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी कला में ऐसे शीर्ष पर पहुंचे थे जहां सम्मान उनके हाथों का स्पर्श पाकर सम्मानित होते थे और भारत के शायद ही ऐसा कोई शीर्ष सम्मान होगा जो उनको न अर्पित किया गया हो। 11 अप्रैल, 1956 को राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने हिन्दुस्तानी संगीत सम्मान अर्पित किया राष्ट्रपति के ही हाथों 27 अप्रैल, 1961 को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 16 अप्रैल, 1968 को पद्मभूषण, 22 मई, 1980 को पद्म विभूषण के बाद 4 मई 2001 को तत्कालीन राष्ट्रपति के .आर. नारायणन ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया।

गांव की पगडंडी तक बजनेवाली और राजघराने की चटाई तक सिमटी शहनाई को उस्ताद ने संगीत के महफिल की मल्लिका बना दिया. भोजपुरी और मिर्जापुरी कजरी पर धुन छेडने वाले उस्ताद ने शहनाई जैसे लोक वाद्य को शास्त्रीय वाद्य की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया. संगीत के इस पुरोधा को पाठ्य पुस्तक में शामिल किया गया है. लेकिन ताज्जुब की बात ये है कि ऐसे व्यक्तित्व पर आम लोगों तक गलत विषय वस्तु की प्रस्तुति कई सवाल खड़े कर देते हैं . बिहार टेक्स्ट बुक के दसवीं कक्षा की हिन्दी पाठ्य पुस्तक “ गोधूलि” (भाग-2) के प्रथम संस्करण- 2010-11 में “नौबतखाने में इबादत” में उस्ताद के नाम कमरुद्दीन की जगह अमिरुद्दीन ( पृष्ठ सख्या-92-97) प्रकाशित किया गया है. जो बेहद शर्मनाक है और ताज्जुब है की तीन सालों में भी इसमें कोई सुधार नहीं की गयी है ...

सोमवार

 हर साल की तरह दशहरा इस बार भी निभा  ही लिया



  एक बार फिर  रावण  मार कर जश्न  मना  ही  लिया 


  लेकिन दिलो में बसे रावण को हम साल भर पालते है 


  क्योकि अपनी लंका को सोने की बनाने को जो ठानते है 


  और साल में एक बार अपने दिलो को सकूं देने के लिए 


 दिखावे के लिए ही रावण को मार कर खुद को राम जानते है

रविवार

हर शाम मैं धुआँ धुआँ हो बिखर जाता हूँ ,
के कभी किसी शाम यह जलन तेरे प्यार की होगी .
हर शाम मैं पलकों से आँखों को भी सी जाता हूँ ,
के आँसू जो छलके मेरे होठों पे तेरे लिए खारेपन की निशानी होगी .
आँखें उलझ जाती है जो कभी तेरी आँखों के धागों से ,
हर शाम मैं पतंग सा कट के उड़ जाता हूँ ,
के कट ही ना जाऊ कभी तेरी नझर के मांझों से.
हर शाम मैं धुआँ धुआँ हो बिखर जाता हूँ ,
के मेरी ये जिद्द है अब हर शाम तेरी जुल्फ तले होगी.
हर शाम मैं खुद को एक याद बना बहा भी आता हूँ ,
के यादें जो बरसी तो यह बाढ तेरी यादों की होगी .
कभी तेरी पागलों सी बातों में तो कभी बेबात ही हँसी में ,
हर शाम मैं तो इनमे तेरी जुल्फों सा उलझ जाता हूँ ,
के सुलझु तो क्या रखा है गैरों की बातों में.
हर शाम मैं धुआँ धुआँ हो बिखर जाता हूँ ,
के साँसे जो तू लेगी तो यह खुशबू मेरी ही होगी .

बुधवार

पढ़ना-लिखना सीखो




                         
पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो 
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो 

क ख ग घ को पहचानो 
अलिफ़ को पढ़ना सीखो 
अ आ इ ई को हथियार 
बनाकर लड़ना सीखो 

ओ सड़क बनाने वालो, ओ भवन उठाने वालो 
खुद अपनी किस्मत का फैसला अगर तुम्हें करना है 
ओ बोझा ढोने वालो ओ रेल चलने वालो 
अगर देश की बागडोर को कब्ज़े में करना है  

क ख ग घ को पहचानो 
अलिफ़ को पढ़ना सीखो 
अ आ इ ई को हथियार 
बनाकर लड़ना सीखो 

पूछो, मजदूरी की खातिर लोग भटकते क्यों हैं? 
पढ़ो,तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों हैं?
पूछो, माँ-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों हैं? 

पढ़ो, लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा 
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा 
पढ़ो, अगर अंधे विश्वासों से पाना छुटकारा 
पढ़ो, किताबें कहती हैं - सारा संसार तुम्हारा 

पढ़ो, कि हर मेहनतकश को उसका हक दिलवाना है 
पढ़ो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है 

क ख ग घ को पहचानो 
अलिफ़ को पढ़ना सीखो 
अ आ इ ई को हथियार 
बनाकर लड़ना सीखो

शनिवार

वीरांगना महिला थी बिहार के आरा की धरमन बाई

स्वतंत्रता संग्राम में पुरूषों ने जितना योगदान दिया है उसमें हमकदम बनकर महिलाओं ने भी उनका सहयोग किया है। इतिहास भी इसका गवाह है, चाहे वो झांसी की रानी हो या फिर बेगम हजरत महल। ऐसी ही एक वीरांगना महिला थी बिहार के आरा की धरमन बाई। पेशे से तवायफ धरमन बाई को महान स्वतंत्रता सेनानी वीर कुंवर सिंह से अकूत प्रेम था। अपने प्रेम की खातिर इस विरांगना ने अपनी शहादत दे दी थी। 

कहा जाता है कि धरमन बाई और करमन बाई दो बहने थीं, जो आरा बिहार की तवायफ थी। बात 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय की है। इन दोनों का मुजरा काफी प्रसिद्ध था, जिसे देखने के लिए वीर कुंवर सिंह भी जाते थे। उसी दौरान इन दोनों से उनकी आंखे चार हुई। बाबू कुंवर सिंह इन दोनों से बेपनाह मोहब्बत करने लगे, लेकिन धरमन को वो अपने ज्यादा करीब पाते थे, शायद इसी वजह से उन्होंने धरमन से शादी कर ली। 

यहां तक कहा जाता है कि बेपनाह मोहब्बत का ही नतीजा था कि करमन बाई के नाम पर कुंवर सिंह ने करमन टोला बसा डाला, जो आज भी विद्यमान है वहीं धरमन बाई के नाम पर धरमन चौक के अलावा आरा और जगदीशपुर में धरमन के नाम पर मस्जिद मस्जिद का निर्माण करवाया।

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. नीरज सिंह कहते हैं कि धरमन बाई से बाबू कुंवर सिंह को सच्ची मोहब्बत थी। उस मोहब्बत को एक नाम देने के लिए उन्होंने धर्मन से शादी भी कर ली। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में जहां जहां कुंवर सिंह गए साथ-साथ धर्मन भी गई। उसी दौरान मध्यप्रदेश के रीवा से काल्पी जाने के क्रम में अंग्रेजों से कुंवर सिंह का सामना हुआ। तब धर्मन ने अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया और अपनी शहादत दे दी।

बाद में कुंवर सिंह रीवा से काल्पी होते हुए आजमगढ़ पहुंचे। वहां से वे बिहार के आरा के समीप स्थित जगदीशपुर जाने के लिए रवाना हुए तो अंग्रेजों ने उनपर हमला कर दिया। इस दौरान ग्रामीणों ने उनका भरपूर सहयोग किया और उन्हें गंगा पार कराने में मदद की। इस दौरान उनके हाथ में गोली भी लग गई। जब उन्होंने अपने साथियों को अपना हाथ काटने को कहा तो वे सब मना कर दिए ऐसे में कुंवर सिंह ने अपनी तलवार निकाली और अपने हाथ को काटकर गंगा को भेंट कर दिया।

डॉ. सिंह कहते हैं कि कटे हुए हाथ के साथ वो आरा पहुंचे औऱ सैनिकों की मदद से आरा नगर पर 23 अप्रैल को कब्जा कर लिया। उसके बाद जगदीशपुर के किले पर कब्जा जमाने के लिए अंग्रेजों के साथ जबर्दस्त युद्ध हुआ और वो 26 अप्रैल को शहीद हो गए। 23 अप्रैल को आरा नगर पर कब्जा जमाए जाने के कारण विजयोत्सव मनाया जाता है।